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लालची कुत्ता

 

लालची कुत्ता

परिचय

यमुना नदी के किनारे बसा एक छोटा-सा गाँव था, जिसका नाम था नदियापुर। यह गाँव अपनी शांत वादियों, हरे-भरे खेतों और नदी के साफ पानी के लिए जाना जाता था। गाँव के लोग आपस में मिलजुल कर रहते थे, और उनके पशु भी उनके परिवार का हिस्सा थे। इन्हीं पशुओं में एक कुत्ता था, जिसका नाम था भोलू। भोलू एक चतुर और फुर्तीला कुत्ता था, लेकिन उसकी एक कमी थी—वह बहुत लालची था। उसे हमेशा और ज्यादा खाने की चाह रहती थी, चाहे उसका पेट भरा हो या नहीं।

भोलू को गाँव के लोग बहुत प्यार करते थे। वह दिनभर गाँव में इधर-उधर दौड़ता, बच्चों के साथ खेलता और रात को अपने मालिक, एक किसान named रमेश, के घर की रखवाली करता। रमेश हर दिन भोलू को भरपेट खाना देता, और कभी-कभी उसे ताज़ी रोटियाँ भी देता, जो भोलू को बहुत पसंद थीं। लेकिन भोलू का मन कभी संतुष्ट नहीं होता था। वह हमेशा सोचता, "काश मुझे और रोटियाँ मिलें!"

कहानी की शुरुआत

एक दिन, रमेश ने भोलू को एक बड़ी, गर्मागर्म रोटी दी। रोटी की खुशबू इतनी अच्छी थी कि भोलू की लार टपकने लगी। उसने रोटी को मुँह में दबाया और खुशी-खुशी गाँव की ओर चल पड़ा। उसे लगा कि वह रोटी को किसी शांत जगह ले जाकर आराम से खाएगा। गाँव के बाहर यमुना नदी पर एक पुराना लकड़ी का पुल था, जो गाँव को जंगल से जोड़ता था। भोलू ने सोचा कि वह नदी के उस पार जंगल में जाकर रोटी खाएगा, जहाँ कोई उसे परेशान नहीं करेगा।

जैसे ही भोलू पुल पर चढ़ा, उसने अपने मुँह में रोटी को और मजबूती से दबाया। नदी का पानी नीचे बह रहा था, और उसकी सतह इतनी साफ थी कि उसमें आसमान और आसपास की हर चीज़ का प्रतिबिंब दिखाई देता था। भोलू ने नीचे की ओर देखा और अचानक ठिठक गया। पानी में उसे एक और कुत्ता दिखाई दिया, जिसके मुँह में भी एक रोटी थी। यह कोई और नहीं, बल्कि भोलू का ही प्रतिबिंब था, लेकिन भोलू को यह समझ नहीं आया।

लालच का परिणाम

भोलू ने सोचा, "अरे, यह कुत्ता मेरे जैसा ही है, और इसके मुँह में भी रोटी है! अगर मैं इसकी रोटी छीन लूँ, तो मेरे पास दो रोटियाँ होंगी!" उसका लालची मन जोर मारने लगा। उसने बिना सोचे-समझे भौंकना शुरू किया, "भौं! भौं!" जैसे ही उसने मुँह खोला, उसके मुँह से रोटी छूटकर नदी में जा गिरी। पानी की तेज़ धारा रोटी को बहाकर ले गई, और भोलू बस उसे देखता रह गया।

अब भोलू को समझ आया कि पानी में जो कुत्ता दिख रहा था, वह उसका अपना ही प्रतिबिंब था। उसने अपनी रोटी खो दी थी, और अब उसके पास कुछ भी नहीं बचा था। वह उदास होकर पुल पर बैठ गया और अपनी गलती पर पछताने लगा। "काश मैं इतना लालच न करता," उसने सोचा। "मेरे पास एक रोटी थी, जो मुझे खुशी-खुशी खानी चाहिए थी। अब मेरे पास कुछ भी नहीं है।"

सबक

जब भोलू उदास मन से घर लौटा, तो रमेश ने उसकी हालत देखी। उसने भोलू से पूछा, "क्या हुआ, भोलू? तुम्हारी रोटी कहाँ गई?" भोलू ने अपनी पूँछ हिलाकर और उदास आँखों से रमेश की ओर देखा, जैसे अपनी गलती बता रहा हो। रमेश समझ गया कि भोलू ने कुछ गलती की है। उसने भोलू को प्यार से सहलाया और कहा, "कोई बात नहीं, भोलू। गलतियों से हम सीखते हैं। अगली बार जो मिले, उसे संभालकर रखना और लालच मत करना।"

रमेश ने भोलू को एक और रोटी दी, और इस बार भोलू ने उसे बड़े ध्यान से खाया। उसने ठान लिया कि वह फिर कभी लालच नहीं करेगा। गाँव के बच्चे जब भोलू की कहानी सुनते, तो हँसते और उससे सीख लेते। भोलू भी अब पहले से ज्यादा समझदार हो गया था। वह अपनी हर चीज़ को संतुष्टि के साथ इस्तेमाल करता और दूसरों की चीज़ों पर नज़र नहीं डालता।

निष्कर्ष

यह कहानी हमें सिखाती है कि लालच हमें हमेशा नुकसान पहुँचाता है। जो हमारे पास है, उसमें संतुष्ट रहना और उसे संभालकर रखना ही समझदारी है। भोलू की तरह, हमें अपनी गलतियों से सीखना चाहिए और यह समझना चाहिए कि लालच बुरा बल है। संतोष और मेहनत से मिली चीज़ों का मूल्य हमेशा ज्यादा होता है।

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