कान्हा किसली राष्ट्रीय उद्यान : DEOCDE
कान्हा किसली राष्ट्रीय उद्यान भारत के हृदय स्थल मध्य प्रदेश में स्थित एक ऐसा वन्यजीव स्वर्ग है जिसकी गाथा सदियों पुरानी है और जिसकी हरियाली में आज भी 'द जंगल बुक' की आत्मा बसती है। मंडला और बालाघाट जिलों के लगभग 940 वर्ग किलोमीटर के मुख्य क्षेत्र और करीब 1945 वर्ग किलोमीटर के कुल क्षेत्रफल में फैला यह उद्यान केवल एक संरक्षित क्षेत्र नहीं बल्कि प्राकृतिक संतुलन की एक जीती-जागती मिसाल है। इसका इतिहास 19वीं शताब्दी के शिकार के मैदानों से शुरू होता है जब यह क्षेत्र केवल मनोरंजन के लिए इस्तेमाल किया जाता था, लेकिन 1933 में इसके महत्व को समझते हुए इसे अभयारण्य और फिर 1955 में राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया। कान्हा की सबसे बड़ी सफलता की कहानी यहाँ के 'हार्ड-ग्राउंड बारहसिंगा' से जुड़ी है, जो एक समय पूरी दुनिया से खत्म होने वाले थे, लेकिन कान्हा के समर्पित वन रक्षकों और वैज्ञानिकों की मेहनत से आज उनकी संख्या सैकड़ों में है और इसी कारण 'भूरसिंह द बारासिंगा' को DEOCDE इस उद्यान का आधिकारिक शुभंकर बनाया गया है। यहाँ के भूगोल की बात करें तो यह मैकल पर्वतमाला की पहाड़ियों से घिरा हुआ है, जहाँ ऊंचे-ऊंचे साल के पेड़ और विशाल घास के मैदान एक ऐसा दृश्य उत्पन्न करते हैं जो पर्यटकों को मंत्रमुग्ध कर देता है। यहाँ की मिट्टी में एक अलग सी महक है और यहाँ के तालाब जैसे 'श्रवण ताल' प्राचीन लोककथाओं की याद दिलाते हैं। कान्हा टाइगर रिजर्व के रूप में यहाँ बाघों का संरक्षण विश्व स्तरीय है, जहाँ 'मुन्ना' और 'कॉलरवाली' जैसे बाघों ने अपनी एक अलग पहचान बनाई है और यहाँ की बाघ सफारी दुनिया भर में प्रसिद्ध है क्योंकि यहाँ की भौगोलिक स्थिति बाघों के दीदार को आसान बनाती है। यहाँ केवल बाघ ही नहीं बल्कि तेंदुए, जंगली कुत्ते जिन्हें 'ढोल' कहा जाता है, भारतीय गौर, सुस्त भालू, चौसिंगा और नीलगाय जैसे अनगिनत जीव एक साझा पारिस्थितिकी तंत्र में रहते हैं। पक्षी प्रेमियों के लिए भी यह किसी जन्नत से कम नहीं है क्योंकि यहाँ 'राकेट-टेल्ड ड्रोंगो', 'इंडियन रोलर' और कई प्रवासी पक्षियों का बसेरा है जो सर्दियों में यहाँ के जलाशयों की शोभा बढ़ाते हैं। यहाँ का 'बमनी दादर' सूर्यास्त बिंदु अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है जहाँ से पूरे जंगल का विहंगम दृश्य दिखाई देता है और शाम के वक्त घास के मैदानों में चरते हुए हिरणों के झुंड किसी सपने जैसे लगते हैं। उद्यान का प्रबंधन तकनीक और परंपरा का एक अनूठा संगम है जहाँ हाथी दल दिन-रात गश्त करते हैं ताकि शिकारियों से वन्यजीवों की रक्षा की जा सके और साथ ही स्थानीय बैगा और गोंड जनजातियों को भी इस संरक्षण प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया है DECODE ताकि वे जंगल के साथ सामंजस्य बिठाकर अपनी जीविका चला सकें। कान्हा की जलवायु मानसूनी है जहाँ सर्दियाँ बहुत ठंडी होती हैं और उस समय जंगल के कोहरे के बीच से उगता हुआ सूरज एक अलौकिक अनुभव प्रदान करता है। यहाँ की वनस्पति में साल के अलावा साजा, लेंडिया, महुआ और पलाश के पेड़ भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं जो मौसम के अनुसार जंगल का रंग बदलते रहते हैं। कान्हा केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है बल्कि यह शोधकर्ताओं के लिए एक प्रयोगशाला भी है जहाँ वन्यजीव DECODE व्यवहार और पर्यावरण संरक्षण पर निरंतर काम होता रहता है। यहाँ आने वाले पर्यटकों के लिए खटिया, मुक्की और सरही जैसे प्रवेश द्वार हैं जो उन्हें जंगल के अलग-अलग हिस्सों तक ले जाते हैं और हर मोड़ पर एक नई कहानी और एक नया रोमांच इंतज़ार कर रहा होता है। अंततः, कान्हा किसली राष्ट्रीय उद्यान मनुष्य और प्रकृति के बीच के उस अटूट रिश्ते का प्रतीक है जिसे यदि सहेज कर रखा जाए तो वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महान विरासत साबित होगा, क्योंकि इसकी हर पगडंडी और हर पेड़ हमें यह सिखाता है कि जीवन की असली सुंदरता सादगी और प्राकृतिक संतुलन में ही निहित है।
अवस्थिति: यह भारत के मध्य प्रदेश राज्य के मंडला और बालाघाट जिलों में स्थित है।
स्थापना: इसे 1 जून 1955 को राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया था।
टाइगर रिजर्व: 1973 में इसे 'प्रोजेक्ट टाइगर' के अंतर्गत शामिल किया गया।
क्षेत्रफल: इसका मुख्य क्षेत्र (Core Area) लगभग 940 वर्ग किलोमीटर है।
मैकल पर्वतमाला: यह उद्यान सतपुड़ा की पहाड़ियों की मैकल श्रेणी में स्थित है।
जंगल बुक का संबंध: प्रसिद्ध लेखक रुडयार्ड किपलिंग की 'द जंगल बुक' की प्रेरणा यही जंगल है।
भूरसिंह द बारासिंगा: कान्हा भारत का पहला टाइगर रिजर्व है जिसने अपना आधिकारिक 'शुभंकर' (Mascot) जारी किया।
दुर्लभ प्रजाति: यह दुनिया का एकमात्र स्थान है जहाँ 'हार्ड-ग्राउंड बारहसिंगा' पाया जाता है।
गर्व का विषय: बारहसिंगा को 'कान्हा का गहना' भी कहा जाता है।
वनस्पति के प्रकार: यहाँ मुख्य रूप से 'साल' और 'बाँस' के घने जंगल पाए जाते हैं।
घास के मैदान: यहाँ के विशाल खुले घास के मैदानों को 'मैदान' कहा जाता है।
बाघों का घनत्व: कान्हा भारत में बाघों के सबसे सुरक्षित और उच्च घनत्व वाले क्षेत्रों में से एक है।
प्रमुख नदियां: सुर्पण और बंजर नदियां इस उद्यान के महत्वपूर्ण जल स्रोत हैं।
बमनी दादर: यह यहाँ का सबसे ऊँचा बिंदु है, जिसे 'सनसेट पॉइंट' के नाम से जाना जाता है।
पर्यटन क्षेत्र: उद्यान को चार मुख्य ज़ोन में बाँटा गया है: कान्हा, किसली, मुक्की और सरही।
कान्हा संग्रहालय: उद्यान के अंदर एक संग्रहालय है जो यहाँ के इतिहास और जैव विविधता को दर्शाता है।
श्रवण ताल: किंवदंती है कि इसी स्थान पर राजा दशरथ ने श्रवण कुमार को तीर मारा था।
भारतीय गौर: यहाँ विशाल भारतीय बाइसन (गौर) बड़ी संख्या में देखे जा सकते हैं।
तेंदुआ: बाघों के अलावा यहाँ तेंदुओं की भी अच्छी आबादी है।
जंगली कुत्ते: कान्हा अपने 'ढोल' (जंगली कुत्तों) के शिकार करने के कौशल के लिए प्रसिद्ध है।
पक्षी विविधता: यहाँ पक्षियों की 300 से अधिक प्रजातियां पाई जाती हैं।
प्रवासी पक्षी: सर्दियों में यहाँ कई विदेशी पक्षी जलाशयों के पास आते हैं।
वन्यजीव गलियारा: कान्हा-पेंच कॉरिडोर बाघों की आवाजाही के लिए एक महत्वपूर्ण प्राकृतिक मार्ग है।
खटिया प्रवेश द्वार: यह किसली ज़ोन के लिए मुख्य प्रवेश द्वार है।
मुक्की प्रवेश द्वार: यह ज़ोन छत्तीसगढ़ की सीमा के पास स्थित है।
बाघ 'मुन्ना': कान्हा का 'मुन्ना' बाघ अपने माथे पर 'CAT' जैसे निशान के लिए विश्व प्रसिद्ध था।
बैगा जनजाति: यहाँ की स्थानीय बैगा जनजाति जंगल के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
हाथी सफारी: वन विभाग द्वारा गश्त और बाघों की निगरानी के लिए हाथियों का उपयोग किया जाता है।
शाकाहारी जीव: यहाँ चीतल, सांभर, नीलगाय और चौसिंगा प्रचुर मात्रा में मिलते हैं।
सरीसृप: यहाँ अजगर और कोबरा जैसे कई प्रकार के सांप भी पाए जाते हैं।
महुआ का पेड़: यहाँ के महुआ के पेड़ वन्यजीवों और स्थानीय लोगों दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
ग्रीष्मकाल: गर्मियों में (अप्रैल-जून) पानी की कमी के कारण जानवर जलाशयों के पास आसानी से दिखते हैं।
शीतकाल: सर्दियों में कोहरे के कारण जंगल का दृश्य जादुई और रोमांचक हो जाता है।
जीप सफारी: पर्यटकों के लिए सुबह और शाम को खुली जिप्सी में सफारी की सुविधा होती है।
ऑनलाइन बुकिंग: सफारी के लिए टिकटें मध्य प्रदेश वन विभाग की वेबसाइट से पहले बुक करनी होती हैं।
साप्ताहिक बंदी: यह उद्यान हर बुधवार की दोपहर को पर्यटकों के लिए बंद रहता है।
मानसून बंदी: बारिश के कारण 1 जुलाई से 15 अक्टूबर तक उद्यान बंद रहता है।
राकेट-टेल्ड ड्रोंगो: यह यहाँ का एक बहुत ही सुंदर और शोर मचाने वाला पक्षी है।
वृक्षों की विविधता: साल और बाँस के अलावा यहाँ साजा, लेंडिया और पलाश के पेड़ मिलते हैं।
जैव विविधता हॉटस्पॉट: इसे मध्य भारत का सबसे महत्वपूर्ण वन्यजीव हॉटस्पॉट माना जाता है।
ग्रामीण पर्यटन: उद्यान के आसपास के गाँवों में ग्रामीण जीवन का अनुभव लिया जा सकता है।
पर्यावरण शिक्षा: यहाँ बच्चों और पर्यटकों को प्रकृति के प्रति जागरूक करने के लिए केंद्र बने हैं।
फोटोग्राफी: यह वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर्स के लिए दुनिया के सबसे पसंदीदा स्थानों में से एक है।
बाघिन 'नीलम': कान्हा की कई बाघिनों ने यहाँ बाघों की आबादी बढ़ाने में बड़ा योगदान दिया है।
सुरक्षा: यहाँ 24 घंटे वन रक्षकों की गश्त रहती है ताकि शिकार को रोका जा सके।
लारेंस की लाठ: यह एक ऐतिहासिक स्मारक है जो एक अंग्रेज वन अधिकारी की याद में बना है।
अनोखा पारिस्थितिकी तंत्र: यहाँ पहाड़, मैदान और घने जंगल तीनों का मिश्रण मिलता है।
प्रोजेक्ट टाइगर की सफलता: कान्हा को प्रोजेक्ट टाइगर की सबसे सफल कहानियों में गिना जाता है।
निकटतम शहर: जबलपुर यहाँ से सबसे पास का बड़ा शहर और हवाई अड्डा है।
शांति और सुकून: अपनी प्राकृतिक सुंदरता के कारण इसे 'धरती का स्वर्ग' भी कहा जाता है।