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Saturday, February 14, 2026

मध्यप्रदेश का स्वर्णिम काल: परमार राजवंश और सम्राट राजा भोज का इतिहास: decode

 

मध्यप्रदेश का स्वर्णिम काल: परमार राजवंश और सम्राट राजा भोज का इतिहास :decode

परमार राजवंश

परमार राजवंश

        परमार राजवंश मध्यकालीन भारतीय इतिहास का वह उज्ज्वल अध्याय है जिसने मालवा की भूमि को विद्या, कला और शौर्य के केंद्र के रूप में विश्वविख्यात बनाया। इस वंश की उत्पत्ति के विषय में विद्वानों के बीच विभिन्न मत प्रचलित हैं, जिनमें सबसे प्रमुख 'पृथ्वीराज रासो' में वर्णित आबू पर्वत के अग्निकुंड का सिद्धांत है, जिसके अनुसार परमारों को 'अग्निकुल' का क्षत्रिय माना जाता है। ऐतिहासिक साक्ष्यों और अभिलेखों के विश्लेषण से ज्ञात होता है कि परमार प्रारंभ में राष्ट्रकूटों के सामंत के रूप में कार्य करते थे, किंतु 9वीं शताब्दी के प्रारंभ में उपेंद्र (कृष्णराज) ने मालवा के क्षेत्र में स्वतंत्र परमार सत्ता की नींव डाली। प्रारंभ में इनकी राजधानी उज्जैन थी, जो उस समय का प्रमुख धार्मिक और व्यापारिक केंद्र था, किंतु सुरक्षा और रणनीतिक कारणों से बाद में इसे 'धार' (धारा नगरी) स्थानांतरित कर दिया गया, जहाँ से इस वंश ने भारतीय राजनीति और संस्कृति को सदियों तक प्रभावित किया।


decode: परमार वंश के उत्थान में सीयक द्वितीय और वाक्पति मुंज जैसे शासकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा। सीयक द्वितीय ने राष्ट्रकूटों की अधीनता को पूरी तरह त्याग कर स्वतंत्र राज्य की स्थापना की, जबकि वाक्पति मुंज ने न केवल अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया बल्कि 'मुंज सागर' जैसे जलाशयों का निर्माण कराकर जनकल्याण की मिसाल पेश की। मुंज स्वयं एक उच्च कोटि के विद्वान थे, जिन्होंने पद्मगुप्त और धनंजय जैसे साहित्यकारों को संरक्षण दिया। उनके बाद सिंधुराज ने शासन संभाला, जिन्हें 'नवसाहसांक' के नाम से जाना जाता है। सिंधुराज के समय परमार सत्ता सुदृढ़ हुई, लेकिन इस वंश का वास्तविक चरमोत्कर्ष और स्वर्ण युग उनके पुत्र राजा भोज के राज्याभिषेक के साथ प्रारंभ हुआ। राजा भोज ने 1010 ईस्वी से 1055 ईस्वी तक शासन किया और उनके काल को मालवा का सांस्कृतिक पुनर्जागरण काल कहा जाता है।

राजा भोज एक असाधारण प्रतिभा के धनी शासक थे, जिन्हें 'कविराज' की उपाधि से विभूषित किया गया था। वे न केवल युद्ध के मैदान में पराक्रमी थे, बल्कि व्याकरण, ज्योतिष, आयुर्वेद और स्थापत्य शास्त्र के प्रकांड पंडित भी थे। उनके द्वारा रचित 'समरांगण सूत्रधार' आज भी भारतीय वास्तुकला का सबसे प्रमाणिक ग्रंथ माना जाता है, जिसमें नगर नियोजन और यंत्रों (मशीनों) के निर्माण की विस्तृत व्याख्या की गई है। इसके अतिरिक्त, उन्होंने 'सरस्वती कंठाभरण', 'तत्व प्रकाश' और 'राजमार्तण्ड' जैसे लगभग 84 ग्रंथों की रचना की, जो उनकी बहुमुखी मेधा को दर्शाते हैं। उन्होंने धार नगरी में एक विशाल संस्कृत विद्यालय 'भोजशाला' की स्थापना की, जो कालांतर में ज्ञान का सबसे बड़ा केंद्र बना। आज भी भोजशाला की वास्तुकला और वहां के शिलालेख राजा भोज की शिक्षा के प्रति अटूट आस्था का प्रमाण देते हैं।

स्थापत्य कला के क्षेत्र में राजा भोज का योगदान अद्वितीय है। उन्होंने रायसेन जिले में बेतवा नदी के तट पर 'भोजपुर' नामक नगर बसाया और वहां एक विशाल शिव मंदिर 'भोजेश्वर' का निर्माण प्रारंभ करवाया। इस मंदिर का शिवलिंग विश्व के सबसे विशाल अखंड पाषाण शिवलिंगों में गिना जाता है, जिसे 'उत्तर भारत का सोमनाथ' भी कहा जाता है। इसके साथ ही, उन्होंने भोपाल (तत्कालीन भोजपाल) शहर की स्थापना की और वहां एक विशाल झील का निर्माण कराया, जो आज भी शहर की जीवनरेखा है। उनके शासनकाल में मालवा आर्थिक रूप से अत्यंत समृद्ध था क्योंकि उन्होंने कृषि को बढ़ावा देने के लिए सिंचाई की उन्नत व्यवस्था की थी। उनकी ख्याति इतनी अधिक थी कि उनके शत्रुओं ने भी उनकी विद्वत्ता और न्यायप्रियता का लोहा माना।

परमार वंश का पतन राजा भोज की मृत्यु के पश्चात प्रारंभ हुआ, जब आंतरिक कलह और बाहरी आक्रमणों (विशेषकर चालुक्य और कलचुरी शासकों द्वारा) ने राज्य की नींव हिला दी। यद्यपि जयसिंह और उदयादित्य जैसे शासकों ने राज्य को संभालने का प्रयास किया, लेकिन दिल्ली सल्तनत के बढ़ते प्रभाव के सामने वे अधिक समय तक टिक नहीं सके। 1305 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति ऐन-उल-मुल्क मुल्तानी ने अंतिम परमार शासक महलक देव को पराजित कर मालवा पर अधिकार कर लिया। हालांकि परमारों का राजनीतिक अंत हो गया, लेकिन राजा भोज द्वारा स्थापित सांस्कृतिक मूल्य और उनके द्वारा निर्मित ऐतिहासिक धरोहरें आज भी मध्यप्रदेश के गौरव के रूप में जीवित हैं। "कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली" जैसी लोकोक्तियाँ आज भी समाज में उनकी श्रेष्ठता और लोकप्रियाता को जीवंत बनाए हुए हैं।


परमार वंश का शासन मुख्य रूप से मालवा क्षेत्र पर केंद्रित था, लेकिन अपनी शक्ति के चरमोत्कर्ष (विशेषकर राजा भोज के काल) के दौरान इनका प्रभाव वर्तमान मध्यप्रदेश के कई जिलों और पड़ोसी राज्यों तक फैल गया था।

यहाँ परमार कालीन प्रमुख क्षेत्रों और वर्तमान जिलों के अनुसार शासन का विवरण तालिका में दिया गया है:

परमार कालीन प्रमुख क्षेत्र और वर्तमान जिले

क्षेत्र का नाम (ऐतिहासिक)वर्तमान जिला (MP/Rajasthan)महत्व एवं प्रमुख साक्ष्य
धारा नगरी (राजधानी)धार (Dhar)राजा भोज की मुख्य राजधानी। यहाँ भोजशाला, वाग्देवी मंदिर और लौह स्तंभ (Iron Pillar) स्थित हैं।
उज्जयिनीउज्जैन (Ujjain)परमारों की पहली राजधानी। राजा मुंज और भोज ने यहाँ अनेक मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया।
भोजपाल / तालभोपाल (Bhopal)राजा भोज द्वारा बसाया गया शहर। यहाँ उन्होंने विशाल भोजताल (Upper Lake) का निर्माण कराया था।
भोजपुररायसेन (Raisen)यहाँ विश्व प्रसिद्ध भोजेश्वर महादेव मंदिर है, जिसे 'उत्तर भारत का सोमनाथ' कहते हैं।
विदिशा (भेलसा)विदिशा (Vidisha)परमारों के अधीन एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र। यहाँ के 'विजय मंदिर' का संबंध परमार काल से रहा है।
नर्मदा तट (मांधाता)खंडवा (Khandwa)ओंकारेश्वर के आसपास का क्षेत्र। यहाँ परमार कालीन वास्तुकला के अवशेष मिलते हैं।
भृगुकच्छभरूच (गुजरात)राजा मुंज के समय यह क्षेत्र परमारों के प्रभाव में था, जो एक प्रमुख बंदरगाह था।
अर्बुद मण्डलसिरोही (माउंट आबू, राजस्थान)परमारों की उत्पत्ति स्थली। यहाँ के अचलगढ़ और चन्द्रावती पर परमारों की शाखा का शासन था।
वागड़ क्षेत्रडूंगरपुर / बांसवाड़ा (RJ)यहाँ परमारों की एक स्वतंत्र शाखा (अर्थूना के परमार) शासन करती थी।
महाकाल वनदेवास / शाजापुरये क्षेत्र उज्जैन और धार के बीच होने के कारण सैन्य छावनियों के रूप में उपयोग होते थे।

परमार कालीन प्रशासनिक संरचना 

परमारों ने अपने साम्राज्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए उसे निम्नलिखित इकाइयों में विभाजित किया था, जो आज की प्रशासनिक व्यवस्था से मिलती-जुलती है:

  • देश / मण्डल: सबसे बड़ी इकाई (जैसे आज का प्रदेश/संभाग)।

  • विषय: मण्डल के नीचे की इकाई (जैसे आज का जिला)।

  • भोग / पट्टला: तहसील स्तर की इकाई।

  • ग्राम: प्रशासन की सबसे छोटी इकाई, जिसका प्रमुख 'ग्रामणी' या 'पटेल' होता था।

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